"हिंदी केवल संवाद का साधन नहीं, यह हमारी सहस्त्राब्दियों पुरानी सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता का धड़कता हुआ प्राण है। जब तक विश्व पटल पर हिंदी को उसका न्यायोचित आधिकारिक सम्मान नहीं मिल जाता, हमारी साधना अविरल रहेगी।"
डॉ. बिपिन कुमार जी के भाषणों, शोध पत्रों एवं आलेखों से संकलित प्रमुख वैचारिक सूत्र
"स्मृति और मानसिक एकाग्रता का विकास ही युवाओं को भटकाव से बचाकर राष्ट्र निर्माण की सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित कर सकता है।"
"सांस्कृतिक स्वाधीनता के बिना राजनीतिक स्वाधीनता का कोई गहरा अर्थ नहीं रह जाता। हमें अपनी भाषा और ज्ञान परंपरा पर गर्व करना सीखना होगा।"
"प्रवासी भारतीय सात समुद्र पार भारत की अमर संस्कृति के संवाहक हैं। फिजी से मॉरीशस तक उनकी भक्ति ने रामकथा और हिंदी को जीवंत रखा है।"
"योग मात्र शरीर को लचीला बनाने की क्रिया नहीं, यह मन, बुद्धि और आत्मा के सामंजस्य से आंतरिक चेतना को प्रदीप्त करने की सनातन विद्या है।"
"150 से अधिक देशों में बोली जाने वाली हिंदी अब वैश्विक भाषा बन चुकी है। इसे संयुक्त राष्ट्र की 7वीं आधिकारिक भाषा बनाना केवल औपचारिकता नहीं, विश्व न्याय है।"
"जब कोई बालक अपनी मातृभाषा में चिंतन करता है, तो उसकी मौलिकता, सृजनशीलता और आत्मविश्वास का सर्वोच्च विकास होता है।"
राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित डॉ. बिपिन कुमार जी के प्रमुख आलेख
हो चि मिन्ह सिटी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन की ऐतिहासिक सफलता और मिले दोहरे रिकॉर्ड्स का प्रामाणिक विवरण।
पूरा आलेख पढ़ेंशिक्षा नीति में मातृभाषा के समावेश से विद्यार्थियों की मौलिक प्रतिभा और भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनरुत्थान पर गहन विमर्श।
पूरा आलेख पढ़ेंविश्व भर में फैले भारतीय प्रवासियों की सांस्कृतिक अस्मिता और हिंदी भाषा के वैश्विक विस्तार पर डॉ. बिपिन कुमार का विश्लेषण।
पूरा आलेख पढ़ेंविश्व पटल पर हिंदी की बढ़ती शक्ति और संयुक्त राष्ट्र में इसे 7वीं आधिकारिक भाषा का गौरव दिलाने की विस्तृत कार्ययोजना।
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